
ग्वालियर में प्रचलित राजनीति लोगों को लुभावने और काल्पनिक वादों में उलझाये रखने में बहुत माहिर है। नवंबर 1956 में मध्यप्रदेश बनने से लेकर वर्तमान तक आये दिन जनता को काल्पनिक वादे कर कोई न कोई झुनझुना थमा दिया जाता है। जनता भी कुछ दिन सपनों में खोई रहती है। जब भूलने लगते हैं फिर कोई नया झुनझुना दे दिया जाता है।
* ग्वालियर में तानसेन रोड को बहोड़ापुर से सीधी रोड से जोड़ने की (किले के नीचे सुरंग बनाकर) योजना बन चुकी है।
* कभी नदी को साफकर नावें चलाने की योजना आती है।
* साडा के नाम पर करोड़ों खर्च कर दिये गये। परिणाम???
* करोड़ों खर्च कर नाला पक्का कर दिया। हार्वेस्टिंग ठप्प। जल स्तर??? परिणाम???
* स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों खर्च किये गये। फरिणाम???
* आजकल नाले पर ऐलीवेटेड रोड का काम बताया जा रहा है। यदि ये बन भी गयी तो परिणाम क्या अच्छा होगा??? सही योजना बनाने की जगह छोटे क्षेत्र में घिचपिच करते रहते हैं। लश्कर का निर्माण केवल एक लाख लोगों के हिसाब से हुआ था। अब ग्वालियर की जनसंख्या लगभग 20 लाख से ज्यादा होगी। लेकिन पुरानी सीमा रेखा में ही तोड़फोड़, परिवर्तन, निर्माण होते रहते हैं। परिणाम न तो ठीक से चलने की जगह है और न ही ठीक से रहने की जगह है।
* ऐतिहासिक स्मारक या तो निर्माण से दबा दिये जाते हैं। या फिर तोड़ दिये जाते हैं। जबकि शहर की सीमा को बहुत बढ़ा देना चाहिये था। अतिक्रमण रुकता। लोगों को काम बहुत ज्यादा मिलता। जमीन की कीमतें नियंत्रित रहतीं। शहर योजनाबद्ध तरीक़े से बसता। ऐतिहासिक स्मारक खुले, बागयुक्त, सुंदर दिखते। शहर स्वच्छ और व्यवस्थित होता। लेकिन…
ऐसे ही रोपवे की बात करें। इसका प्रस्ताव सबसे पहले 1969 में बना था। 1972 में निर्माण कंपनी निश्चित हो गयी थी। तब लागत 4 लाख रुपये आ रही थी। लेकिन??? यह प्रोजेक्ट अब तक सही योजना नहीं होने से अटका पड़ा है। किले पर तो छोड़िये। निचले टर्मिनल की जगह ही निश्चित है क्या??? अब लागत इतनी बढ़ चुकी है। उस पूंजी का ब्याज/ बिजली खर्च/ स्टाफ खर्च/ मैंटीनेंस खर्च/ आदि को जोड़कर लाभ??? क्या कोई निजी कंपनी काम के लिये तैयार होगी??? कभी भी रोपवे के लिये टूरिस्ट नहीं आते हैं। टूरिस्ट आते हैं तो रोपवे एक आकर्षण और हो सकता है। स्थानीय लोग एक दो बार से ज्यादा उपयोग नहीं करते हैं। मॉल, वाटरपार्क आदि के उदाहरण सामने हैं। ऐसे में लागत तक निकालना बहुत विचारणीय होगा। तब रोपवे के लिये किसी एक को दोष देना कहाँ तक सही है???
ग्वालियर में एजी ऑफिस की बिल्डिंग से पहले कोई शासकीय निर्मित भवन तक नहीं था। ग्वालियर में अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवा 1937 में थी लेकिन 1956 से स्थिति सबके सामने है। 1971 तक शहर में 12 स्टेशनों के बीच लोकल ट्रेन चलती थी। सीमेंटेड सड़कें थीं। उद्योग, व्यापार, आदि बहुत कुछ था। लेकिन अब…???
जिम्मेदार कौन…???
“इति सिद्धम्…”




