ग्वालियर प्रशासन का अनूठा प्रयोग: ‘पुस्तक मेला’ बना अभिभावकों के लिए बड़ी राहत, करोड़ों की ओर बढ़ता कारोबार

ग्वालियर। शिक्षा के व्यावसायीकरण और महँगी होती स्कूल सामग्री के दौर में ग्वालियर जिला प्रशासन की एक नई पहल ने आम जनता के चेहरों पर मुस्कान बिखेर दी है। कलेक्टर श्रीमती रूचिका चौहान के निर्देशन में शिल्प बाजार परिसर (मेला ग्राउंड) में आयोजित ‘नवाचार पुस्तक मेला’ इन दिनों शहर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मेले की सबसे खास बात यह है कि यहाँ अभिभावकों को अपने बच्चों की किताबों और स्टेशनरी के लिए शहर भर के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे, बल्कि एक ही छत के नीचे शहर के लगभग सभी प्रमुख स्कूलों का कोर्स उपलब्ध है।
प्रशासनिक कड़ाई और बेहतर प्रबंधन का असर कीमतों पर भी साफ दिख रहा है। जिला शिक्षा अधिकारी श्री हरिओम चतुर्वेदी के अनुसार, मेले में शामिल हर व्यापारी के लिए पुस्तकों पर न्यूनतम 10% और स्टेशनरी पर 20% की छूट देना अनिवार्य किया गया है। इस पारदर्शी व्यवस्था का नतीजा यह रहा कि महज कुछ ही दिनों में मेले ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। 27 मार्च 2026 की शाम तक के आंकड़े बताते हैं कि अब तक 2,401 अभिभावक यहाँ से खरीदारी कर चुके हैं, जिससे कुल 29,43,747 रुपये का कारोबार हुआ है।
आर्थिक लेनदेन से इतर, इस मेले का एक मानवीय चेहरा ‘बुक बैंक योजना’ के रूप में सामने आया है। मेले में शिक्षा के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए पुराने छात्रों के पालकों ने कक्षा नर्सरी से 12वीं तक की अपनी पुरानी किताबों के 130 सेट दान किए। प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए इन किताबों को 49 जरूरतमंद विद्यार्थियों को निशुल्क वितरित कर दिया, जिससे उनकी पढ़ाई की राह आसान हो गई।
मेले में मौजूद फीडबैक रजिस्टर अभिभावकों की संतुष्टि की गवाही दे रहा है। अभिभावक प्रदीप उपाध्याय, राहुल अग्रवाल और श्रीमती शिवानी मिश्रा जैसे कई लोगों ने प्रशासन के इस प्रयास को ‘सराहनीय’ बताते हुए कहा कि बाजार की तुलना में यहाँ किताबें काफी कम दाम पर और बिना किसी परेशानी के उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर, ग्वालियर का यह पुस्तक मेला न केवल एक बाजार है, बल्कि मध्यमवर्गीय परिवारों को राहत पहुँचाने का एक सफल प्रशासनिक मॉडल बनकर उभरा है।




